Home Dhinchak Lekh रमज़ान इबादत अकीदत और मुहब्बत का महीना।

रमज़ान इबादत अकीदत और मुहब्बत का महीना।

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Eid 2020

रमज़ान, ऐसा महीना जो आपको एहसास दिलाता है कि भूख क्या होती है प्यास क्या होती है, ताकि आप उस तकलीफ को समझ सके और ऐसे लोगो की मदद करे जिन्हें तीन वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। कोरोना के चलते पूरे देश में लॉकडाउन है, अगर तीन मई को लॉकडाउन खुलता भी है तो तब तक रमज़ान के कई रोज बीत चुके होंगे। इसलिए जाहिर सी बात है कि ये रमज़ान पिछले सभी रमजान से बहुत ही ज्यादा अलग है।


आम तौर पर रमज़ान इबादत और शॉपिंग का एक बेहतरीन मौका होता है। पर शायद इस दफा रोजेदारों को सिर्फ इबादत से ही काम चलाना पड़ेगा। पर शायद ये सही मौका है खुद को खुद के और करीब ले जाने का। आम तौर पर रमज़ान की आहट शब ए बारात के बाद ही लग जाती है।
मुस्लिम घरों में रमज़ान के राशन की एक अलग लिस्ट बनती है। दूसरे महीनों के मुकाबले इस महीने किचन में ज्यादा भीड़ होती है जबकि इस महीने में सिर्फ दो वक्त का ही खाना बनता है।
आइए मै बताता हूं कि एक आम मुस्लिम का रोज़ा किस तरह बीतता है।


रमज़ान की शुरुआत चांद देख कर होती है, लोग मगरिब की नमाज़ के बाद आसमान में चांद देखने की कोशिश करते है, कई मर्तबा चांद दिखता है तो कई दफा चांद की तस्दीक होने का इंतज़ार करना पड़ता है। रोज़े का वक्त सूरज निकलने से पहले शुरू होता है और सूरज निकलने के बाद खत्म होता है।

इस दफा रमजान का पहला रोज़ा 4:48 am से शुरू होगा और शाम को 7:03 पर खत्म होगा। रोजेदार सुबह 4:48 से पहले अपनी सहुलत के मुताबिक हल्का नाश्ता करते है, कुछ लोग पूरा खाना भी खाते है, सहरी में खाने की कोई लिमिट नहीं बताई गई है, मुस्लिम अपनी सहुलत के हिसाब से जितना चाहे खा सकते है, बस उन्हें इस बात का ध्यान रखना है की अगले रोज रोज़े के वक्त उन्हें कच्ची डकार न आए।


सहरी करने का वक्त फज्र की नमाज़ की अजान के साथ खत्म हो जाता है, फज्र की अजान के बाद रोजेदारों को पानी भी पीने की इजाजत नहीं है। रोजेदार नमाज़ पढ़कर घरों को वापस आते है और कुरआन शरीफ की तिलावत करते है। रोजेदार के लिए कई तरह की पाबंदियां होती है, यहां तक कि किसी को ग़लत निगाह से देखना भी रोजे से मिलने वाले सवाब को कम कर देता है। दिन भर मुस्लिम इबादत करते है, और नमाज़ पढ़ते है।


बहुत से मुस्लिम रोज़े के दौरान सो कर भी गुजारा करते है। शाम को असर की नमाज़ के बाद और मगरिब की अजान के बीच का वक्त रमज़ान में बहुत इंपॉर्टेंट होता है। इस दौरान मुस्लिम घरों से अलग अलग डिशेज की खुशबू आती रहती है। मुस्लिम इस वक्त मिस्वाक करते है, रोज़े के दौरान टूथपेस्ट इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होती है इसलिए मुस्लिम मिस्वाक या नीम के दातुन का इस्तेमाल करते है।


मगरिब की अजान से दस पन्द्रह मिनट पहले मुस्लिम अपने घरों या मस्जिदों में इकट्ठा होते है, और इफ्तार के पकवानों के सामने बैठ कर अज़ान का इंतेज़ार करते है। इफ्तार से पहले खाने के सामने बैठ कर अज़ान का इंतेज़ार करना एक मुस्लिम का उसके खुदा के लिए मुहब्बत को दिखाता है कि वो सब कुछ सामने होते हुए भी अपने खुदा की मर्जी के बगैर उन्हें हाथ नहीं लगाना चाहता।


इफ्तार में लोगों की हैसियत के हिसाब से अलग अलग डिशेज होती है, पर शर्बत पकौड़ी और पापड़ ये तीन चीजे लगभग हर मुस्लिम के दस्तरखान पर मौजूद होती है। अक्सर गर्मी में रमज़ान पड़ने की वज़ह से ज्यादातर रोजेदार शर्बत और ठंडे पानी को ही ज्यादा तरजीह देते है। इफ्तार के बाद मुस्लिम मगरिब की नमाज़ के लिए जाते है।


मगरिब की नमाज़ के बाद कुछ लोग खाना खाते है तो कुछ तरावीह के बाद खाना पसंद करते है।
तरावीह इशा के बाद पढ़ी जाती है, इसमें इमाम नमाज़ के दौरान आयतों की जगह पूरी कुरआन पढ़ कर सुनाता है। तरावीह की नमाज़ के बाद मुस्लिम खाना खाते है और अगले दिन सहरी की उम्मीद लिए सो जाते है। पूरा रमज़ान इसी तरह गुजरता है। रमज़ान चांद के हिसाब से कम से कम 29 दिन का और ज्यादा से ज्यादा 30 दिनों का होता है।


रमज़ान के दौरान किए गए पुण्य का सवाब आम दिनों में किए गए पुण्य से ज्यादा मिलता है।
इस दौरान जकात देने का प्रचलन है। हर मुस्लिम के ऊपर उसकी हैसियत के मुताबिक जकात फ़र्ज़ होता है। मुस्लिम ईद की नमाज़ से पहले तक ज़कात अदा कर देते है। इस पैसे का इस्तेमाल यतीम बच्चो और गरीबों के लिए होता है। रमज़ान को दान का महीना भी कहते है, मुस्लिम पूरे महीने गरीब लोगो को कपड़े और खाने के समान देते रहते है।


एक अच्छा मुस्लिम अपने आस पास नजर बनाए रखता है कि कहीं उसके मुहल्ले में कोई परेशान हालत में तो नहीं है। रमज़ान का ये महीना ईद के चांद दिखने के साथ खत्म हो जाता है।

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