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रक्षा का बंधन

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raksha ka bandhan

★●●”रक्षा का बंधन”●●★

पिछले दस मिनट में वो पांचवी बार आईने के सामने खड़ी थी,
इसके पहले उसने खुद को इतनी बार आईने में भईया की शादी में चेक किया था। 
वो दिन तो खुशी का था,
खुश थी वो,
सजी सवरी,
कभी बाल ठीक करने के लिए,
तो कभी उसे लगता कि लिपिस्टिक खराब हो गयी है। 
लेकिन आज न तो उसे बालो की फिक्र थी,
न कपड़ो की,
वो तो सिर्फ दुपट्टा देखने आ रही थी। 
सीने पर चादर के जैसे दुपट्टे को तीन सेफ्टी पिन से बांध कर भी उसे सुकून नही था। 
हर एक कदम के बाद वो दुपट्टे को छूकर देख रही थी कि वो है भी या नही। 
वो पहली बार बाहर नही जा रही थी,
12वी तक कि पढ़ाई के लिए वो पहले भी गाँव से 5 किलोमीटर पैदल जाती थी,
लेकिन तब साथ मे सहेलियां होती थी। 
लेकिन आज वो अकेली थी। 
उसकी बाकी सहेलियों के घर वाले तैयार नही हुए थे आगे की पढ़ाई के लिए। 
वो भी हिम्मत हार चुकी थी,
लेकिन भईया ने जब हौसला दिया तो उसने भी खुद को तैयार कर लिया। 
लेकिन आज न जाने क्यों उसे अपने ही फैसले पे पछतावा हो रहा था,
5 किलोमीटर तक तो ठीक था,
अकेली भी चली जाती,
लेकिन 25 किलोमीटर दूर दूसरे शहर जाकर पढ़ना मुश्किल था। 
आज उसे 2 मीटर का दुपट्टा छोटा लग रहा था। 
घड़ी देखी तो बस का वक्त हो गया था,
उसने आखरी बार आईना देखा,
सेफ्टी पिन को हाथ लगाकर चेक किया,
फिर घर से निकल गयी। 
बाहर जाते वक्त उसने नजर सिर्फ इतनी ही ऊपर रखी कि वो चलते वक्त किसी चीज से लड़ न जाये। 
उसे अपने बदन अपने चेहरे,
अपने सीने पर लोगो की नजर की तपिश महसूस हो रही थी। 
उसके पीछे लोग बहुत धीमे धीमे बात कर रहे थे,
लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके कान में कोई वो बाते कह रहा हो। 
एक बार को तो उसने सोचा कि वापस चली जाए,
लेकिन फिर भईया का सोच कर आगे चल पड़ी। 
कुछ देर बाद बस सामने रुकी,
बस के अंदर सीट खाली नही थी तो वो बीच मे हैंडल पकड़ कर खड़ी हो गयी। 
नजर अब भी बस की फर्श पर कुछ ढूढ़ रही थी,
शायद उसका आत्मविश्वास गिरा पड़ा था वहां पर। 
आगे बढ़ते बढ़ते बस में भीड़ और बढ़ गयी,
कुछ जगह बस ब्रेक लगाती तो पीछे के लोग उस पर गिरने लगते। 
वो थोड़ा और सिमट के खड़ी हो गयी। 
कई बार ऐसा हुआ,
कुछ देर बाद अहसास हुआ कि पीछे खड़े लोग अब ब्रेक मारने का भी इन्तेजार नही कर रहे थे। 
उसे नही लग रहा था कि अब वो कालेज जा पाएगी। 
“टिकट”
एक अजीब आवाज सुनकर उसने सर ऊपर किया,
सामने एक 40 साल का सख्स खड़ा था,
जिसके एक हाथ मे रुपये और दूसरे हाथ मे टिकट की रसीद थी। 
उसने पर्स से 5 रुपये निकाल कर दे दिए,
उसे भईया ने बताया था कि बस वाले कालेज जाने वाले से इतना ही लेते है। 
“ये क्या है मैडम?”
कंडक्टर ने उसके दिए पांच के सिक्के को उसकी आँखों से सामने नचाते हुए कहा। 
“किराया है भईया,
कालेज जा रहे है,
रोज आते जाते है।”
उसने कांपते हुए हड़बड़ाहट में भइया से सीखा हुआ रटा रटाया उसे सुना दिया।
“क्या मैडम,
इस बस में सारे कालेज वाले ही है,
सबसे पांच रुपया लूंगा तो बस क्या पानी से चलाऊंगा।”
कंडक्टर ने अजीब सा मुह बनाते हुए कहा। 
उसे लग रहा था कि अब वो बैठ जाएगी जमीन पर,
अपने आत्मविश्वास के साथ,
उसके पैर और उसकी हिम्मत जवाब दे चुके थे,
उसे समझ आ रहा था कि भईया और वो बहुत बेवकूफ थे,
उसकी सहेली के घरवाले ठीक कहते थे। 
उसने पर्स खोला और पचास का नोट कंडक्टर के हाथ मे थमा दिया,
पानी भरी आंखों को जब उसने नीचे किया तो दो बूंदे कंडक्टर के पैर पर गिर पड़ी। 
“वापस आके बचे पैसे देता हूं आपको।”
कंडक्टर बिल्कुल नई और धीमी आवाज में कहकर आगे बढ़ गया। 
कंडक्टर हाथ मे पचास के नोट को देखकर पछता रहा था। 
उसका काम यही था,
उसे भी तो मालिक को पैसे देने होते है। 
लेकिन उसे अभी अहसास हो रहा था कि उसने गलत किया। 
रोज कई लोग इसी पांच रुपये में जाते है,
ये भी चली जायेगी तो क्या घट जाएगा। 
उसका पैर उस लड़की के दो आंसुओ से गीला हो चुका था। 
उसे अहसास हो रहा था कि यहां बात टिकट की नही थी। 
वो पलट कर उस लड़की को देखने लगा,
वो इन लड़कियों को अच्छे से जानता था,
डरी सहमी ये लड़कियां उसकी बस में अक्सर चढ़ती थी,
लेकिन दुबारा वो उन लड़कियों को अपनी बस में नही देखता था। 
उसे समझ आ रहा था कि कल ये भी नही आएगी। 
उस लड़की के पीछे की मर्दो की टोली उसे पीसने पर आमादा थी। 
कंडक्टर सब समझ रहा था,
वो रोज ये सब देखता था। 
“कहा जाना है?”
कंडक्टर ने उससे पूछा। 
“कालेज जाना है।”
जवाब में वो बस इतना ही बोल पायी।
“अरे बेटा,
कौन से कॉलेज उतरना है?”
कंडक्टर के इस सवाल पर उसने उसकी तरफ़ देखा,
अब उसकी आँखों मे डर कम था,
शायद बेटा कहकर उसने उसकी झिझक खत्म कर दी। 
“आरडीएम कालेज।”
उसकी बात सुनकर कंडक्टर आगे बढ़ा,
आगे दो सीट थी,
एक पर एक लड़का और एक लड़की बैठी थी,
कंडक्टर ने जाने क्या बात की उस लड़के से और उसे उठाकर अपनी सीट पर बैठा दिया। 
“आओ बेटा”
कंडक्टर ने कहा और वो उसके पीछे पीछे चल दी। 
“ये भी उसी कालेज में पढ़ती है,
इनके साथ उतर जाना,
कोई दिक्कत नही होगी। 
और तुम परेशान मत होना,
रोज आना इसी सीट पर बैठ जाना। “
उस खाली सीट पर बैठाकर कंडक्टर ने उसके सर पर हाथ रख कर कहा। 
और जाते जाते उसके हाथ मे पचास का नोट रख दिया। 
उसे न जाने क्यों अब लग रहा था कि वो बस में नही घर मे बैठी है,
और अभी अभी भईया उसके सर पर हाथ रखकर गए है। 
वो अपनी हथेली पर उस आत्मविश्वास को देख रही थी जो कंडक्टर ने जमीन से उठाकर उसकी हाथ मे रख दिया था। 
वो कभी बस को कभी बस में बैठे अपने भइया को देखकर सोच रही थी कि,
“रक्षा का कोई बंधन नही होता।”

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