Home Dhinchak Story लूला – बेहतरीन हिंदी कहानी

लूला – बेहतरीन हिंदी कहानी

185
0
SHARE
Loola Best Hindi Story

जब नयी नयी नौकरी लगी तो ख़ुशी बहुत हुई।  सोचा था कि घर परिवार का सहारा बन जाऊँगा,
लेकिन इस ख़ुशी के बीच में ये चुभन भी थी कि अब मैं बाइक का इंतेजाम कहा से करूँगा। ऐसा नहीं था कि मैं कोई इतना नवाब टाइप आदमी हू जो बस या मेट्रो से नहीं जा सकता ऑफ़िस।लेकिन दिक़्क़त ये थी कि मेरे नसीब में नौकरी तो थी लेकिन वो AC वाला ऑफ़िस नहीं था जिसके मैं सपने देखता था। 

मार्केटिंग का काम था और ऊपर से फ़ील्ड वर्क।  इसलिए बाइक हर हाल में चाहिए थी।  किसी तरह कुछ पैसे जुट गए। अब समस्या थी कि बाइक कौनसी ली जाए। दोस्तों की सलाह थी की गाड़ी हीरो की ही लेना, कोई और लोगे तो बेचते वक़्त दाम अच्छा ना मिलेगा। कई जगह गया, बाइक पसंद आती तो बजट छोटा पड़ जाता, और बजट में जो बाइक आ रही थी उसे देखने का मन ना होता था।  लोग कहते है कि जोड़ियाँ ऊपर वाला बनाता है। 

इसलिए दुनिया भर की खोजबींन के बाद मुझे मेरी कर्म संगिनी मिल ही गयी। वो भी अपने ही मुहल्ले में। गाड़ी ठीक ठाक थी, और बेचने वाले ने मुहल्ले का होने की वजह से हेल्मट भी साथ में दे दिया। और जो पाँच हज़ार मेरे बजट के बाहर थे, उसके लिए भी उन्होंने दो महीने की मोहलत दे दी। मेरी ये ख़ुशी तब तक रही जब तक पहली बार बाइक ने मुझे धोखा ना दिया। 


धोखे की उम्मीद तो मुझे थी ही लेकिन इतनी जल्दी ना थी।  किसी तरह मैं बाइक को अपने पसीने से घसीटता हुआ किसी तरह पास के मकैनिक के पास ले गया।  “छोटू ज़रा पानी मिलेगा एक ग्लास? बड़ी प्यास लगी है और कोई मकैनिक हो तो उससे बोल दो की ये बाइक देख ले ना जाने क्यूँ स्टार्ट नहीं हो रही।” मैंने वहाँ खड़े एक लड़के को आवाज़ लगाते हुए कहा जो की कपड़ों से उसी वर्क्शाप का लग रहा था। 

“ये लीजिए पानी, ठंडा है, और मेरा नाम छोटू नही है, प्रिन्स है प्रिन्स।” कुछ देर बाद वो लड़का मेरे सामने स्टील के ग्लास में पानी लेकर खड़ा था।  मैंने ग्लास के पानी को ख़ाली करके एक नज़र उसपर डाली। वो कोई दस ग्यारह साल का लड़का था,आँखो में ग़ुस्सा ग़ुरूर या क्या था मैं समझ नहीं पाया था।  लेकिन बातो से साफ़ पता चल रहा था कि उसे ख़ुद को छोटू बुलाना पसंद नहीं है। 
“छोटू, क्या कर रहा है वहाँ पर, यहाँ आकर भैया की बाइक का टायर खोल।”


उसी दौरान उसे उसके मालिक ने बुलाया।  छोटू बुलाने पर उसके चेहरे पर अजीब नी निराशा छा गयी।  “क्या बात है प्रिन्स साहब, हम बुलादे तो बुरा लगता है, कोई और बुलाए तो ठीक?” मैंने उससे मज़ाक़ के मूड में पूछा। “मैं समझदारों को बात समझाता हूँ साहब, चूतियों को नहीं।” उसके मुँह से ऐसी बात सुनकर थोड़ा अजीब सा तो लगा लेकिन उसकी हालत के लड़के इससे भी ख़राब भाषा बोलते थे। 

“एक बात बता दे रहा हू आपको, स्पार्क प्लग में दिक़्क़त है आपके, साफ़ करके स्टार्ट करिए हो जाएगी, नहीं तो बेवजह मेरा चूतिया मालिक आपसे दो सौ रुपए लेगा।” वापस लौट कर उसने मुझ से धीरे से कहा।  “लेकिन अगर मैं यहाँ से वापस गया तो तुम्हारा मालिक डाँटेगा नहीं तुम्हें?”
मैंने उससे उसकी आँखो में देखते हुए कहा।  “आपको क्या लगता है? अगर आप दो सौ रुपए देकर जाएँगे अपने तो क्या मेरा मालिक मुझे शाबाशी देगा? वो तब भी गाली देगा हर दस मिनट में देता है, ताकि मैं अपनी औक़ात ना भूलूँ।”


उस दस साल के बच्चे की बात में दुनिया की समझदारी दिख रही थी मुझे। मैंने उसकी बात मानने में ही भलाई समझी, और गाड़ी को बाहर ले गया।  स्पार्क प्लग साफ़ करते ही गाड़ी स्टार्ट हो गयी। 
मुझे सच में ख़ुशी हुई, मैं वापस दुकान में गया और उस लड़के को बुलाकर बीस रुपए दे दिए। 
उसने चुपचाप रख लिए और कही और देखने लगा।


ख़ैर दुनिया में हर भरोसेमंद चीज़ का मिलना मुश्किल है, उनमें से और ज़्यादा मुश्किल है एक भरोसेमंद मकैनिक मिलना।  मुझे मिल गया था इसलिए मैं ख़ुद को ख़ुशनसीब समझ रहा था। अब लगभग हर दूसरे महीने पर मैं उस दुकान पर सर्विस कराने जाता था।  अब प्रिन्स मुझसे थोड़ा खुल भी गया था।  “पता है साहब, मैं ना बस दो महीने में पूरा काम सीख जाऊँगा, फिर आप मेरे यहाँ आना बाइक लेकर अपनी, बस मोबिल का पैसा दीजिएगा बाक़ी मैं सब फ़्री में करूँगा।”
उसने ना जाने किस धुन में मुझसे कहा।  “अच्छा और प्रिन्स साहब की हम पर ये मेहरबानी किस ख़ुशी में?” मैंने उससे पूछा।  “वो साहब क्या है ना कि, आप जब भी आते हो कुछ ना कुछ दे जाते हो, तो वो मेरे लिए बोनस की तरह होता है।


अब मेरा भी जब टाइम आएगा तो मैं भी तो आपको रेटान गिफ़्ट दूँगा ना।” वो आज बड़ा ख़ुश नज़र आ रहा था। मैंने सोचा की उसे टोकूँ की रेटान नहीं रिटर्न गिफ़्ट होता है, लेकिन फिर मैंने सोचा की उसे जो ख़ुशी रेटान में मिल रही है वो रिटर्न बोलने में कहा से मिलेगी।  ख़ैर मेरी बाइक का काम ख़त्म हुआ तो मैंने जाते हुए हमेशा की तरह उसे छुपाकर सौ रुपए दे दिए।

“क्या बात है साहब आज डबल? सैलरी बढ़ गयी क्या?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।  मैंने हाँ में सर हिलाया और चला गया।  एक हफ़्ते बाद ऑफ़िस से आते वक़्त गाड़ी एक ऑटो वाले लड़ गयी।  मुझे ज़्यादा चोट तो नहीं लगी लेकिन बाइक की हेड्लायट टूट चुकी थी।  “क्या साहब बड़ी जल्दी, स रुपए वापस लेने आए हो क्या?” छोटू ने मुझे देखते ही कहा। 


“अरे नही प्रिन्स साहब बस गाड़ी ज़रा सी ठूक गयी है उसी लिए आया हु।”मैंने उसकी बात पर हँसते हुए कहा।  वो भी गाड़ी की हेड्लायट चेंज करने लगा। “तो क्या किया उन पैसों का?”
मैंने उससे पूछा। “क्या करूँगा साहब, चुटकी बीमार थी तो उसी की दवा में लग गए।” उसने हेड्लायट के नट खोलते हुए कहा।  “तुम्हारी बहन भी है क्या?” हाँ साहब है ना, डेढ़ साल की है।”
उसने कहा। 


“अच्छा तुम्हारे पापा तो होंगे नहि ना तभी तुम यहाँ काम करते हो?” मैंने उससे थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।  “हाँ बाप तो मर गया मेरा, लेकिन जब वो ज़िन्दा था तभी उसने मुझे यहाँ काम सीखने भेजा था। अब साहब इत्ति महँगाई में एक जन के कमाने से कितना होगा?” उसकी बाते मुझे और पूछने पर मजबूर कर रही थी। “कैसे, कैसे मरा था तुम्हारा बाप?” मेने फिर डरते डरते पूछा था उससे। 


“वो तो अभी दस महीने पहले मरा है, वो कच्ची शराब पीने से मर गया था।  पेपर में फ़ोटू भी आए था उसका।  मेरा भी नाम आया था।” ये सब बताते हुए पता नहीं क्यूँ उसके चेहरे पर अफ़सोस या शिकायत ना थी।  “तो क्या करोगे अब?” मैंने पूछा।  “करना क्या है साहब काम सीख चुका हू मैं दो महीने बाद मालिक मेरी तनख़्वाह देगा, दस हज़ार जमा किया है मैंने उसके पास। 


फिर उसी पैसों से यही कही कोने में वर्क्शाप खोलूँगा।” उसने ख़ुशी ख़ुशी बताया।  “प्लान तो बढ़िया है यार।” मैंने उससे कहा।  गाड़ी ठीक हो गयी तो मैं लेकर चला गया। जाते वक़्त उसे मैंने फिर सौ रुपए दिए जिसे उसने चुपचाप रख लिया।  इस बार गाड़ी की सर्विस कराने जाने लगा तो मैंने रास्ते से कुछ रेंच और बाक़ी कुछ छोटे मोटे औज़ार ख़रीद लिए सोचा कि प्रिन्स को गिफ़्ट करूँगा तो उसे अच्छा लगेगा। 

मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि प्रिन्स नहीं था। “प्रिन्स कहा है संजय भाई? “मैंने दुकान के मालिक से पूछा।  “कौन प्रिन्स” दुकानदार ने उलटा मुझसे सवाल किया।  “अरे वो छोटू कहा है?” मैंने दुबारा पूछा।  “अच्छा छोटू, वो तो चला गया हमने निकाल दिया, वो क्या है ना कि नाबालिग़ लड़कों को काम कराने पर पोलिस बड़ा परेशान कर रही थी, इसलिए निकालना पड़ा उसे।”

मैंने कुछ नहीं कहा और भारी मन से वापस आ गया।  धीरे धीरे छः महीने बीत गए, लेकिन प्रिन्स मिला नहीं मुझे, उसी दौरान लोगों से पूछ कर उसके घर भी गया तो पता चला की मकान मालिक ने उसे और उसके माँ को घर से निकाल दिया है किराया ना देने की वजह से। धीरे धीरे मैं ये सब भूलता गया लेकिन जब भी बाइक से जूड़ा कोई मसला होता तो मुझे प्रिन्स ज़रूर याद आता। 
इस दौरान कम्पनी ने मेरा प्रमोशन कर दिया। 


काम के सिलसिले में दूसरे शहर भी जाना पड़ता था।  ऐसे ही एक यात्रा पर जब मेरी टैक्सी रेड लाइट पर खड़ी थी तो मुझे प्रिन्स दिखा, थोड़ा दुबला हो गया था पर पहचान तो सकता ही था। 
मैं जल्दी से कार से उतरा और उतर कर उसकी तरफ़ भागा। “अरे प्रिन्स साहब? कहा ग़ायब हो गए थे आप? इतना ढूँढा मैंने। वो मुझे देखकर थोड़ा हैरान था। “साहब आप यहाँ इस शहर में कैसे?” उसके मुँह से बस इतना ही निकल पाया। 


“अरे वो सब छोड़ो तुम यहाँ का क्या कर रहे और अच्छे खासे कारीगर हो तुम, यहाँ सिग्नल पर बैठकर भीख मागने की क्या ज़रूरत।” मैंने उससे ग़ुस्से में कहा।  “और कोई चारा ही नही बचा था इसके सिवा मेरे पास।” उसकी बातो में उदासी थी।  फिर उसने मुझे पूरी बात बतायी। 

हुआ ये था कि, छोटू के काम सीखने के एक दो दिन बाद ही उस इलाक़े में रेड पड़नी शुरू हो गयी। सारे दुकानदार के ऊपर जुर्माना लगाया गया। इनमें से प्रिन्स का मालिक भी था। प्रिन्स को उसने काम से निकल दिया।  प्रिन्स ने सोचा की जो पैसे जमा है उसे ही इस्तेमाल कर लूँगा अपनी दुकान डालने में।  पर दुकानदार ने ये कहते हुए पैसे देने से इंकार कर दिया की जुर्माने की रक़म में से काट ली मैंने। 


थक हार कर छोटू ने और दुकानो पर काम तलाशने की कोशिश की पर सरकार के डर से कहीं काम ना मिला।  उसने हर तरह का काम तलाशने की कोशिश की मगर नाकाम रहा।  नौबत ये आ गयी कि उसके मकान मालिक ने उसको और उसकी माँ को घर से निकाल दिया। थक हार कर वो यहाँ इस शहर में आ गया। 


काम की तलाश की मगर काम ना मिला।  फिर ऐसे ही एक भिखारी लड़के से मिला और उसके उसको ये भीख मागने का काम दिला दिया।  ये सब सुनकर मेरा दिल पसीजने लगा।  “सही है साहब, वहाँ दिन भर मालिक की गाली सुनकर और मेहनत करके उतना नहीं मिलता था जितना यहाँ बैठे बैठे मिल जाता है। और भिखारी की तो कोई अब ऊमर भी नहि पूछता साहब, और पोलिस से मेरा दलाल सब समझ लेता है।  और तो और एक अंग्रेजन भी आयी थी, मेरा फ़ोटो भी खींचा था उसने। 


बाप की तरह मेरी भी आयी होगी फ़ोटू। और ठीक ही है साहब, पोलिस और दलाल को देने के बाद इतना बच जाता है की माँ बेटे सुकून से खा लेते है।” उसने बहुत ख़ुशी ख़ुशी बताया। “और चुटकी?” मुझे अचानक कुछ याद आया।  “वो थोड़ी कमज़ोर निकली साहब ट्रेन में ही मर गयी। 
आज ज़िंदा होती तो यहाँ बग़ल में बैठाता उसको कमाई डबल हो जाती। वो अब भी नहीं बदला था किसी के मरने पर शिकायत ना होती उसे या शायद वो करना नहीं चाहता था। 


“अच्छा वो सब छोड़िए प्रिन्स साहब, चलो मेरे साथ वापस मेरे पास पैसे है मैं तुम्हारी दुकान कराऊँगा सब ठीक हो जाएगा।” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा।  “अब नहीं काम कर सकता साहब, वो क्या है ना कि ठीक ठाक भिखारी को पब्लिक पैसा नहीं देती है, इसलिए मुझे भी करना पड़ा ये।” पहली बार मैंने उसकी आँखों में शिकायत की हल्की झलक देखी।  और मैं पत्थर की तरह जमे हुए उसके हथेली को देख रहा था जिसमें उँगलियो की जगह सफ़ेद कपड़ा था। 
उन हाथो में वो हुनर सीखकर बड़ी हुई उँगलियाँ नहीं थी। “और हाँ साहब, अब मेरा नाम प्रिन्स नहीं है, छोटू भी नहीं है, लूला बुलाते है सब मुझे।”

|| समाप्त ||

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here