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कभी गुजरे हो तुम उस डर से

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Sad Poem About Love and Pain in Hindi

कभी गुज़रे हो तुम उस डर से ,
किसी को खोने की डर से,
तनहा रातों में रोने के डर से,
किसी के हाथो को धीरे धीरे अपने हाथो से छूटने देना,
फिर कभी भी उस हाथ के ना मिलने के डर से,
कभी गुज़रें हो तुम ?

सीने में किसी मजबूर पत्थर सी चीज़ के टूटने के डर से,
जिस्म से रूह के साथ छूटने के डर से,
कभी यू लगा कि अब ना मिलोगे उससे तुम,
अब ना होंगे हाथो में वो मेहंदी की कच्ची ख़ुशबू से महकते हाथ,
कभी लगा कि रोओगे उसके रोने पे बहुत,
कभी जागे थे उसके ना सोने पे बहुत,
कभी सोचा था की रहना होगा उसके बग़ैर,
कभी लगा था कि पानी होगा आँखों के कोने पे बहुत।
कभी गुज़रे हो तुम ?

गुज़रना तो डरना मत उस डर से,
क्यूँकि ये डर कुछ भी नहीं है उस डर की हक़ीक़त के सामने,
खुदा ना करे कि तुम भी कभी गुजरो उस डर से,
कभी गुज़रे हो उस डर से ?

इश्क़ बड़ी अजीब सी चीज होती है

इश्क़ बड़ी अजीब सी चीज होती है, जिससे इश्क़ होता है न उसका वजूद उसका मिजाज घुस जाता है, जहन में, बदन में कहीं अंदर। मै शुरू से लापरवाह था, कुछ भी संभाल नहीं पाता था। अक्सर चीजे गुम हो जाती थी मुझसे, या टूट जाया करती थी। वो सब कुछ संभाल कर रखती थी, मैंने जो गिफ्ट दिए उसे उसके रैपर तक संभाल कर रखे थे उसने, मै उसके दिए गिफ्ट भी संभाल कर न रख पाता था।

वो सब कुछ संभाल कर रखती थी, पहले रिश्ते को संभाला फिर मुझे, पर आखिर में वो भी लापरवाह ही निकली मेरी तरह, अपनी सांसे न संभाल पाई, और जाते जाते मुझे सब कुछ संभाल कर रखने का हुनर दे गई, अब मै उसकी यादे संभाल कर रखता हूं, और उसकी यादे मुझे।

जिस रोज तुम्हारा हाथ छूटा उस रोज मैं गंगा को छूकर बैठ गया। मैंने दाई ओर देखा, एक कपल बैठा था, उस जगह जहां हम और तुम बैठते थे। बाईं ओर लोग गंगा में दिए बहा रहे थे, मैंने पूछा नहीं किसी से क्यों, क्युकी गंगा भी तो नहीं पूछती।

मैंने देखा, वहां हर कोई कुछ न कुछ फेकने बैठा था, कोई कंकर फेंक रहा था तो, कोई सिगरेट का बचा छिलका फेंक रहा था, तो कोई किसी अपने की याद से जुड़ी चीज।

आने वाला हर इंसान गंगा में कुछ न कुछ फेक कर आता है, जैसे किराया अदा करता है गंगा को। मैंने टटोला खुद को, जेब खाली थी और जहन भी, कुछ था ना मेरे पास जिससे मैं गंगा को किराया देता। मैंने हाथ रखा सीने पर, तुम्हारा दुख था, तुम्हारे जाने का दुख था, तुम्हारे न होने का दुख था।

हर दुख तुम्हारा था, पर तुम्ही तो कहती थी कि जो तुम्हारा है वो मेरा है। मैंने उंगलियों से खींच कर तुम्हारे दुख को सीने से निकाला, गंगा की तरफ देखा, पर तुम्हारे दुख को नहीं देखा। और फिर तुम्हारे दुख को गंगा में फेंक कर चल दिया। अब कभी कभार चला जाता हूं,

बैठता हूं गंगा के किनारे, दाई ओर नया जोड़ा बैठा मिलता है, बाईं ओर लोग अपना दुख बहा रहे होते है, और मेरे सामने, तुम्हारा दुख तैरता हूंआ दिखता है, गंगा की सतह में। मैं अब बस उसी को देखने आता हूं। तुम्हारा दुख तैरता है गंगा में क्युकी, डूबती जिंदा चीज़े है, तुम्हारा दुख तो तुम्हारे साथ ही मर गया था।



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