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होली के पटाखे

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होली के पटाखे

“समोसे खाएगा?”
मैने उस दस साल के बच्चे से पूछा तो उसने खुशी के सर हिला दिया था।
मेरे पूछने भर से वो इतना खुश हुआ था कि वो चाहकर भी मुस्कुराहट छुपा नहीं पा रहा था।
मिठाई की उस दुकान पर रोज के मुकाबले आज कुछ ज्यादा ही भीड़ थी,
इस भीड़ का एक छोटा सा हिस्सा मै भी था।
वहां खड़े लोगों में सबको इस बात की जल्दी थी कि वो जल्द से जल्द मिठाई लेकर अपने घरों की तरफ निकल ले।


मै इस शहर में नया था,
घर से बहुत दूर इसलिए मुझे घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी।
मिठाई की दुकान के बाहर खड़ा वो लड़का शक्ल से मासूम और हालत से भिखारी लग रहा था।
मैंने दो समोसे लेकर उसके हाथ में रख दिए और वो समोसे लेकर दुकान से एक मुनासिब दूरी पर खड़ा हो गया।
उसके पास दो बच्चे और आ गए जो कि शायद उसके दोस्त थे,
वो बहुत उलझन में दो समोसे के तीन हिस्से करने में लगा हुआ था।
मैंने उसे वापस बुलाया तो वो समोसे अपने दोस्त के हाथ में थमा कर मेरे पास आया।
“उन दोनों को भी बुलाओ,
पूछो क्या खाएंगे वो।”


मेरे कहने की दर थी कि वो उछलता हुआ वापस अपने दोस्तो के पास पहुंचा।
मेरी कहीं बात जब बाकी दोनों के कानों तो पहुंची तो दोनों के चेहरे खिल उठे।
कुछ देर बाद तीनों लड़के समोसे लिए सड़क के किनारे खुश नजर आ रहे थे।
मै कुछ देर तक उन्हें देखता रहा और फिर वक्त का ख्याल आते ही अपनी बाइक के पास पहुंच गया।
“भईया कुछ दे दीजिए,
दो रुपया वाला पड़ाका लेना है।”
मैंने बाईक के शीशे में अपने बाल ठीक कर रहा था कि उस लड़के ने मेरे पास आकर डरते हुए कहा।
उसकी आवाज में एक संकोच था शायद।
मै रहमदिल था पर समझदार भी।
इस तरह के बच्चे खाने से ज्यादा नशे को तरजीह देते है इसलिए पैसे देना मुझे ठीक नहीं लगा।
“चलो बताओ क्या लेना है”


मै बाइक से उतर कर उन तीनों के साथ पास की पटाखों की दुकान तक चला गया।
“रंग लेना है तो ले लो,
होली पर पटाखे जलाओगे?”
मेरी बात पर वो थोड़ा हड़बड़ा गया।
“दीवाली पर नहीं जला पाए थे न भईया,
रंग तो कोई भी फेंक देगा,
पटाखे सब अपना अपना जलाते जलाते है।”
उसने बहुत सादगी से मेरे सवाल का जवाब दिया।


दुकान पर पहुंचने के बाद मैंने उन तीनों को एक एक पैकेट फुलझडी और कुछ पटाखे दिला दिए।
“ये लड़के अगर पटाखे वापस कर के पैसे लेने आए तो मत दीजिएगा।”
मैंने दुकानदार को पैसे के साथ सलाह दी और वापस अपनी बाइक के पास चल पड़ा।
“भईया”
गाड़ी स्टार्ट होते ही वो लड़का फिर पास में आकर बोला।
“क्या है?”
पता नहीं क्यों मै झुंझला गया था इस दफा।
शायद इंसान की दयालुता की भी एक हद होती है,
ये लड़के वो हद पार कर चुके थे।
“अबे तुम लोग को समोसा खिला दिए,
पटाखे दिला दिए और अब भी पेट न भरा तुम्हारा?
कोई उंगली पकड़ा रहा है तो गट्टा न पकड़ो।”
मैंने न जाने कहां की झुंझलाहट उस बच्चे पर उतारी और बाइक लेकर निकल गया।


रास्ते भर मुझे अफसोस था कि शायद चिल्लाना नहीं चाहिए था मुझे पर मैंने खुद को ये कहकर समझा लिया कि मैंने कम से कम कुछ दिलाया तो था उन्हें,
बाकी तो लोग बिना कुछ किए दुत्कार देते है उन बच्चो को।
मै इन्हीं सब उलझनों में किचन में चाय बनाने घुसा।
चाय उबल रही थी कि याद आया कि सिगरेट नहीं है।
अपनी इस नादानी पर गुस्सा तो आया पर बिना सिगरेट के चाय पीने का सवाल ही नहीं उठता।
वापस मुझे उसी मार्केट में जाना था,
पर मै इस दफा बचने की फिराक में था,
मुझे लगा कि उन बच्चो ने दुबारा देख लिया तो फिर कुछ मांग लेंगे।
मै नजर सीधी रास्ते पर जमाए हलकी रफ्तार में चला जा रहा था।


मिठाई की दुकान के पास हलकी सी भीड़ लगी हुई थी जो किसी चीज को चारो तरफ से घेर कर खड़ी थी।
उत्सुकतावश मै भी देखने गया और भीड़ को चीरते हुए खुद को थोड़ा आगे किया।
“आजकल के लोग भी न,
औलाद पैदा करके छोड़ देते है,
अब वो चोरी करे या भीख मांगे उन्हें क्या फर्क पड़ता है।”
एक शख्स जो शायद घटना स्थल पर काफी पहले से मौजूद थे अपनी राय बाट रहे थे।
मैंने देखा कि वो बच्चा अपने दोनो दोस्तो के साथ जमीन में रस्सियों से बंधा बैठा था।
वो तीनो नजर झुकाए बैठी थे इसलिए उन्होंने मुझे देखा नहीं।


“क्या किया है इन तीनों ने?”
मैंने भीड़ से सवाल किया।
“अरे पटाखे चुराकर भाग रहे थे,
दुकानदार ने पकड़ा और बांध कर बिठा दिया है,
अब पुलिस आएगी तो इनका इंतेज़ाम करेगी।”
भीड़ से किए गए मेरे सवाल का जवाब भीड़ से ही किसी ने दिया।
“पटाखा नहीं चुराए थे,
एक भईया दिलाकर गए थे,
हम तो बस माचिस चुरा रहे थे,
पटाखा तो हमारा था पर वो दुकानदार सब छीन किया हमसे।”
उस बच्चे ने आंख में आंसू लिए लगभग चीखते हुए भीड़ से कहा।

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