Home Dhinchak Lekh इक बात कहनी थी

इक बात कहनी थी

110
0
SHARE
Hindi Kavita Ek Baat Kahni Thi

इक बात कहनी थी जो कह नही सका मैं,
एक बात थी जो कहनी थी पर कह नही सकता मैं।
एक बात थी जो कह सकता था लेकिन कही नही मैंने,
इक बात थी जो न कहकर भी कह गया मैं।

तुम जिस मौसम को छू जाओ, वो मौसम सुहाना हो जाये,
तुम जिन गलियों में पाव रखो वो मेरा ठिकाना हो जाये,
होठो को तुम्हारे शबनम भी डर डर के छुआ करती होगी,
उन होठो से तुम इकरार करो मेरे जीने का बहाना हो जाये।

खुशियां नजरे चुराए तो उदास न होना,
नींद रातों को न आये तो उदास न होना
तुमको तुम्हारे खनकते झुमकों की कसम
गर मेरी याद सताए तो उदास मत होना।

तुम बनकर आओ चाँद कभी मैं देखु तुम्हे तारो की तरह,
तुम बन जाओ इक छाव घनी मैं माँगू तुम्हे बंजारों की तरह।
मैं सांस भी लू तो छूलू तुम्हे, मैं आंख जो खोलू देखू तुम्हे,
मैं सर्दी की ठंडी रातों में चाहूं तुम्हे दीवारों की तरह।

तेरी आँखों का नशा उतरा ही नही मैं जाम प्याले क्या करता,
शीशे सी नाजुक चीज को मैं पत्थर के हवाले क्या करता।
सूरज आया था रोशनी लेकर मेरे कमरे की खिड़की पर।
मैं दिल को जलाए बैठा था अब और उजाले क्या करता।

मैं इश्क निभाने निकला था,
अब यार गवा कर आया हूं।
दो नैन लुटेरों के हाथों,
संसार लुटा कर आया हूं।

मेरी सूनी पलको पे ख्वाब रहने दो,
तेरी यादों की सीने में आग रहने दो,
यादे भी वादे भी सब तुम ले जाओ
मेरी डायरी में एक गुलाब रहने दे

बेहद है बेहिसाब है,
ख्वाहिश बेताब है,
आंसुओ में बह गया,
तू मेरा है पर ख्वाब है।
तू ख्वाब है।

दर्द के कागज़ पर कुछ लफ्ज़ आराम करने को,
जज्बातों की तपिश में निखरने को संवरने को,
जज्बातों की छलनी से कुछ आंसू निकलने को
रात होती ही है शायद कुछ ख्वाबो के मरने को।

जिंदगी,
कभी बैठ,
कुछ बात करनी है।
तू कभी दोस्त जैसी रही ही नही,
की तुझसे दिलकी हर बात कहूं।

पर जब पांच साल तक कोई ख़बर नहीं आई जमाल साहब की तो उोंने भी िज करना छोड़ िदया, समीर की मा अपने शौहर को जानती थी, इसिलए वो दो साल पहले ही उीद और िज दोनों छोड़ चुकी थी। हर महीने, जरत के पैसे नवेद खान लाकर दे िदया करते थे िक जमाल अर ने भेजा है, ये सच था या झूठ ये जानने समझने की हैिसयत समीर की मा के अंदर नहीं थी। लखनउ के हाथ पाव बढ़ रहे थे उस दौर म, आस पास के गांव अब उस पुराने शहर का िहा इस तरह बनते जा रहे थे जैसे यहां कभी गाव था ही नहीं।

िजस मकान की खड़की से दूर दूर तक िसफ पेड़ और घास के मैदान देखा करता था समीर उस खड़की को ईट की दीवारों ने घेर िलया। उसी दौरान उसके पड़ोस म आई माहा। दोनों घरों की छत एक दूसरे से लगी ई थी। माहा के अू कु छ काम नहीं करते थे, उसकी दो वजह थीं। एक तो यहां आने से पहले वो अपने पीछे की सारी जायदाद बेच आए थे िजससे उ इतना पैसा िमला था िक वो अपनी उ और माहा की शादी दोनों िनपटा लेते। दूसरी वजह थी उनका आलसीपन।

पहली वजह वो शान से बताते थे पर दूसरी वजह उनको िकसी ने बताई नहीं थी। िफर आने वाले तीन सालों म व ने माहा के अू को िनपटा िदया। तीन साल से पड़ोस म रहकर भी िसफ सलाम दुआ करने वाले दोनों पड़ोसी इस के बाद करीब आ गए। शायद दोनों औरतों का ग़म एक जैसा था, शौहर का ना आना शौहर के मर जाने जैसा ही होता है। दोनों औरत साथ बैठकर अपने अपने शौहर को कभी कभी कोस लेती तो कभी उनका सोग मना लेती।

अी बात ये है िक दोनों ही कामो म उ ऐसा साथी िमला था जो उनके जैसा ही था। समीर को याद नहीं िक उसने माहा को पहली दफा कब देखा था, ये मालूम था िक वो उसे रोज देखता था, जैसे सूरज का िनकलना तय था उसकी िजंदगी म, उसी तरह उसकी िनगाहों के सामने माहा का आना तय था, कु दरत का ऐसा िनजाम िजसम छेड़छाड़ न तो कु दरत को पसंद थी न ही समीर को। दसवीं तक साथ पढ़े दोनों, उसके बाद नवेद खान अपने बाल बों म लग गए इसिलए जमाल साहब ने पैसे भेजने भी ब कर िदए थे।

मजबूरन समीर को मेकै िनक का काम सीखना पड़ा। अमीरी ज़बान तेज करती है और गरीब िदमाग, तेज िदमाग के समीर ने कु छ िदनों म पूरा काम सीख कर उसी दुकान म नौकरी शु कर दी। उसकी कमाई मा बेटे के िलए काफी थी। पर इस दौरान समीर अपना नाम समीर जमाल से समीर शाहीन कर चुका था। उसके मुतािबक िजस बाप की श याद नहीं उस बाप का नाम लगाने से बेहतर है िक वो उस मा का नाम लगाए िजसने िजंदगी म िसफ समीर की श देखने का ही सुकू न हािसल आ था। दूसरी तरफ माहा के घर म पैसों की कमी नहीं थी, बाप अकाउंट म इतने पैसे छोड़ गया था िक माहा को कभी िकसी चीज के िलए एडज नहीं करना पड़ा।

खलौने ा होते है समीर कभी नहीं जान पाता अगर माहा उसे अपने खलौने खेलने के िलए न थमाती। बाप की गैरमौजूदगी ने जहा समीर को फमाबरदर और समझदार बनाया था, दूसरी तरफ इसी कमी की वजह से माहा िजी हो गई थी। िजी हर इंसान होता, िजद सबके अंदर होती है, बस िजद वहीं इंसान िदखाता है िजसकी िजंदगी म कोई िजद पूरी करने वाला हो। माहा की िजंदगी म उसकी िजद पूरी करने वाले तीन लोग थे, उसकी मा नरिगस,समीर और समीर की अी शाहीन। समीर शु से अपनी अी का ाल रखता था, वो कई दफा बीमार हो जाती थी इसिलए घर के लगभग सारे काम उसे करने आते थे। यूं तो माहा का नाम भी पहले माहा नहीं था कु छ और था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here