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हिंदी कहानी ‘फौजी’

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A Best Hindi Story Fauji

“मेरा दिल कह रहा है कि मेरे सीट के बग़ल में किसी लड़की की ही सीट होगी,
ऊपर वाला इतना अत्याचार तो नहीं करेगा मेरे साथ।”
पवन ट्रेन के रेज़र्वेशन चार्ट में कुछ ढूँढते हुए कह रहा था।
मैंने उसकी बात सुनी और अनसुना कर दिया। 
मैं वहाँ बग़ल के बुक स्टाल पर अपने लिए किताबें ढूँढ रहा था। 
हम चार दोस्त होली की छुट्टी में घर जा रहे थे। 
पवन,विकास,शनि और मैं। 
विकास और शनि का टिकट कन्फ़र्म था,
लेकिन मैं और पवन अपनी टिकट के कन्फ़र्म होने की दुआ कर रहे थे। 
इसी उम्मीद में पवन बनी हुई चार्ट लिस्ट में हम दोनो का नाम ढूँढने गया था। 
“भाई हमारे बग़ल में लड़की है।”
वो इतनी ज़ोर से चिल्लाया की आसपास के लोग हमें ही देखने लगे। 
उसकी इस हरकत का असर ये हुआ की हम तीनो ने इस तरह दिखाना शुरू किया जैसे इसे हम जानते ही नहीं। 
“अबे चूतियों के पीएम ज़रा धीरे से बोला कर,
आस पास के लोग क्या सोचेंगे?”
कुछ देर बाद मैंने उसको धीरे से कहा। 
“यार पवन आज बकचोदी मत करियों,
वरना ट्रेन से तुझे मैं फेकूँगा।”
इस बार विकास ने भी उसे टोका। 
“अरे वो सब छोड़ो ये देखो कोई लड़की है अपने साथ विमला नाम की।”
पवन को कुछ फ़र्क़ ही नहीं पड़ा था जैसे। 
“अबे ऐल्बर्ट आइंसटाइन के नाजायज़ बाप,
ध्यान से देख,
विमल लिखा है।”
शनि ने एक ही बार में पवन के सारे ख़्वाब चूर चूर कर दिए थे। 
ख़ैर हम चारों ट्रेन में बैठे। 

क्यूँकि हमारे पास दो ही सीट थी इसलिये हमें वहाँ बैठने में दिक़्क़त हो रही थी क्यूँकि साथ के यात्री इस तरह ट्रीट कर रहे थे जैसे हम उनके बाप दादा की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके बैठे हो।
इसी दौरान छोटी मोटी झड़प भी हो चुकी थी,
इन सब चीज़ों से मेरा मूड ख़राब हो चुका था,
इसलिए मैं बाहर गेट पर सिगरेट पीने लगा।
सुकून के तीन चार कश ही लिए होंगे की पवन भागता हुआ आया। 
“भाई वो सीट मिल गयी है हमें,
वेटिंग कन्फ़र्म हो गयी है।”
पवन के ये लफ़्ज़ सुनकर दिल को जो सुकून मिला वो मैं बता नहीं सकता था।
सीट कोनफ़र्म हो चूकी थी। 
एक सीट उसी बोगी में थी,
जिसे हमने विमला यानी की विमल के साथ एक्सचेंज कर लिया। 
दूसरी सीट दो बोगी बाद थी। 
कोशिश हमने उसे भी चेंज करने की की लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ।
ये सोचकर कि रात में जब सोना होगा तब मैं या पवन चले जाएँगे। 
हम दोस्तो को बात करते करते बारह बज गए। 
पवन वहाँ सोने को तैयार हुआ। 
उसे भेजकर हम तीन अपनी सीट सही करने में लग गए। 
सोने जा ही रहे थे कि पवन मुँह लटकाए हमारी तरफ़ आता हुआ दिखा। 
“क्या हुआ बे?
फट गयी अकेले सोने में?”
शनि ने उसे ताना मारा। 
“अबे वो अपनी सीट पर तो कोई पोलिस वाला सोया हुआ है।
मैंने एक बार उठाया पर वो उठ ना रहा।”
पवन ने पूरा हाल कह सुनाया। 
” मैं देख कर आता हू।”
मैंने कहा और पवन को अपनी सीट पर बैठाकर चला गया।
“संभाल के भाई,
पोलिस है क़ायदे से बात करना कही दिक़्क़त ना हो।”
विकास ने मुझसे कहा। 
“हाँ मैं देख लूँगा।”
मैंने कहा और निकल गया। 

रास्ते भर सोच रहा था कि प्यार से समझाऊँगा मान जाए तो ठीक वरना फ़ालतू बवाल की क्या ज़रूरत।
बोगी में पहुँचा तो ज़्यादातर लोग सो रहे थे इसलिए लाइट बंद थी लगभग। 
गेट पर जलती बल्ब की रोशनी में किसी तरह मैंने अपनी सीट ढूँढीं। 
वहाँ पर वर्दी में लेटा हुआ एक सख़्स था जो की काफ़ी गहरी नींद में लग रहा था। 
पोलिस वाला था इसलिए डर के मारे उठाने की हिम्मत ना हो रही थी। 
कुछ मिनट बाद मैंने कुछ सोचकर लाइट जला दी। 
अब जो देखा मैंने वो थोड़ा सुखद आश्चर्य के जैसे था। 
वो पोलिस वाला नहीं था,
कोई फ़ौजी था,
जो कि अपने गोल से बैग को सर के पास लगाकर सो रहा था।
पोलिस सोचकर जो डर में मन में था अब वो बहादुरी की शक्ल में आ चुका था। 
डर अब ग़ुस्से में बदल गया। 
“उठिए,
उठिए।”
मैंने उसे बुरी तरह झिझोड़ते हुए कहा। 
किसी तरीक़े से उसने आधी आँख खोली। 
“ये क्या तरीक़ा हुआ दूसरे की सीट पर क़ब्ज़ा करने का?
आप सर्विस वाले है आपको तमीज़ होनी चाहिए,
अब मैं क्या ज़मीन में सोउ?
आप को ख़ुद सोचना चाहिए,
ऐसे ही ग़ैर ज़िम्मेदारी से आप लोग काम भी करते होंगे।”
पता नहीं मुझमें ग़ुस्सा था या उसे सिर्फ़ एक “फ़ौजी” देखकर आयी बेशुमार हिम्मत थी कि मैंने उस पर इल्ज़ामों की लाइन लगा दी। 
लेकिन उसने अभी भी कुछ नहीं कहा। 
“उठेंगे या मैं टीटी को बुलाऊँ?
उठिए आप।”

मैंने उसके कंधे को पकड़ कर खींचने की कोशिश की थी,
ना जाने किस वजह से मैंने अपने हाथो पर हल्की तपिश महसूस की। 
मेरा हाथ उसे उठाते हुये उसके गले को छू गया था और ये तपिश उसके गाल से ही आ रही थी। 
ना जाने कितना तेज़ बुखार था उसे। 
मैं ये सब सोच ही रहा था कि मेरी नज़र उसकी आँखो पर पड़ी,
जो कि अब पूरी तरह खुली हुई थी और मुझे सवाल भारी निगाहों से देख रही थी।
ना जाने कितने रातों की जागी थी वो आँखे,
लाली ने इतना घेरा था उन आँखो को की सफ़ेदी कही अंदर छुप सी गयी थी।
आँखो की भौ पर एक कटा हुआ निशान था,
जो शायद दुश्मन मुल्क ने नहीं अपने ही मुल्क के किसी सख़्स ने दिया था। 
क्यूँकि दुश्मन मुल्क गोली मारते है पत्थर नहीं। 
उसकी आँखो में सवाल थे,
जो शायद वो इस मुल्क के हर शख़्स से पूछना चाहता था कि क्या यही वो इनाम है जो हम ज़िंदा सिपाहियों को देते है?
क्यूँकि हम इज़्ज़त के लायक ही सिर्फ़ शहीदों को समझते है। 
उसकी आँखें हंस रही थी मुझपर,
मेरी उस झूठी अकड़ पर जो उसे पोलिस वाला समझकर कही छुप गयी थी। 
और भी बहुत कुछ था उसकी आँखो में,
पर मेरी हिम्मत ना हुई की कुछ देर और रुक कर देख सकू। 
उसके आँखो की जलन अब मेरी आँखे भी महसूस कर रही थी। 
मैं जाने के लिए पलटा या शायद भागने के लिए,
“आओ बेटा बैठ जाओ,
वो नींद आ गयी तो इसलिए ध्यान नहीं दे सका।”
उसकी आवाज़ मेरे कानो में पड़ी थी। 
मैं पलटना चाहता था,
माफ़ी माँगना चाहता था,
अपनी बातों अपनी हरकत के लिए। 
लेकिन उसकी आँखो में देखने से डर रहा था। 
मैं मुड़ा नहीं,
“अंकल मेरी सीट दूसरी बोगी में है मैं ग़लत बोगी में आ गया था अभी देखा तो ध्यान आया आप सोईए।”
इतना कहकर मैं वहाँ से चल दिया।

समाप्त

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