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बोझ

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boojh

*:- बोझ -:*_

“एक क्लासिक ब्लु और एक माईल्ड”
मैने पान्च सौ का नोट दिखाते हुये कहा!
“बेटा छुट्टे दे दो”
आन्टी ने बेबसी दिखाते हुये मुझसे कहा!
“अरे आन्टी दे दो ना,
बस यही आखरी नोट बची है वालेट मे,
अब कहा से मै छूट्टा लाऊ?”
मैने पता नही क्यु उनपर खीझते हुये कहा!
“छुट्टा नही हो पायेगा बेटा,
सुबह से सिर्फ दो सिगरेट बेची है,
मेरे पास नही है,
होता तो तुम्हे मना क्यु करती?
देख लो होगा तुम्हारे पास,
नही तो कुछ और ले लो!”
उन्होने उसी लहज़े मे अपनी बात जारी रखी!
सुबह का वक्त था और सिगरेट की तलब जोर पर थी,
और ये बात मै भी समझ रहा था कि उनके पास है नही!
“अच्छा एक काम करिये,
छे माईल्ड दे दीजिये,
नब्बे हो जायेगा बाकि आप तो छुट्टा दे ही देंगी!”
मैने समस्या का समाधान कर दिया!
“हा ये ठीक है”
आन्टी के भी लहज़े मे सुकून था!
मुझे इस सेक्टर मे शिफ्ट हुये कुछ ही दिन हुये थे!
मेरे फ्लैट से ये दुकान सबसे करीब पडती थी इसलिये अक्सर मै सुबह की सिगरेट यही पर पीता था!
शायद उसे दुकान नही कह सकता मै,
सिमेन्ट की बोरियो को जोडकर एक चादर बनाई गयी थी जिसपर आन्टी सिगरेट गुटखा और चाय वगैरह बेचती थी!
जहा तक मेरा अन्दाज़ा था वो गर्मी मे कोल्ड ड्रिंक भी बेचती थी!
कुछ लडको के मुह से मैने ये भी सुना था कि आन्टी “माल” भी बेचती थी!
माल मतलब वीड या आसान भाषा मे कहू तो गांजा!
इसलिये उस छोटी सी दुकान पर आन्टी की ठीक ठाक आमदनी हो जाती थी!
क्युकि वो पूरा सेक्टर ही स्टुडेंट से भरा हुआ था!
इसलिये उनके यहा लडको की भीड हमेशा लगी रहती थी!
आन्टी अक्सर अपने साथ दुकान पर अपने बेटे को ले आती थी,
चार या पान्च साल का होगा वो!
“ये घर पर बैठा रहता है पढता नही,
इसलिये यहा अपने सामने पढाती हू,
ये नालायक बाप जैसा बनना चाहता है पर मै इसे बनने नही दुंगी!
“बेटा जरा इससे कुछ पूछो देखो इसे आता है या नही?”
वो अक्सर मुझे ये काम सौप देती थी!
मै बस टालने के लिये छोटे मोटे सवाल पूछ लेता था!
और जब वो सही जवाब देता तो आन्टी का चेहरा देखने लायक होता था!
“वो इसके स्कूल वाले सही नही है,
वरना ये बहुत मेहनती है!
कुछ पैसे जुट जाये तो इसे अच्छे स्कूल मे डाल दुंगी!”
जब कभी उनका बेटा किसी सवाल पर फस जाता तो आन्टी का यही जवाब होता था!
खैर मेरे हाथ से पान्च सौ की नोट लेकर आन्टी छुट्टा लेने चली गयी!
मै वही खडा होकर इन्तेजार करने लगा!
अचानक से हवा चली और उस बोरीनुमा चादर जरा सी खिसक गयी!
उस फ़टी और मैली हुई चादर के नीचे कई नोट मुझे कन्खियो से ताक रहे थे!
खैर मैने सोचा कि पैसे उड ना जाये इसलिये चादर को सही करने लगा!
तभी मेरी नजर दो गुलाबी नोटो पर पडी!
अलग ही चमक थी उनमे,
जो शायद मेरे अन्दर की अच्छाई को काला करने वाली थी!
बहुत सारे ख्याल एक साथ मेरे दिल मे आये!
हा ये सच था कि वो पान्च सौ की नोट आखरी थी मेरे पास,
और अभी महीना बीतने मे बारह दिन बाकी थे!
शायद हर इन्सान के अन्दर बुराई होती है,
जो सिर्फ मौके की तलाश मे खामोश बैठी रहती है!
मेरी बुराई को भी मौका मिल चुका था!
मै इतना भी बुरा नही था,
लेकिन ना जाने क्यु उस वक्त क्या हुआ कि मैने पहली मर्तबा चोरी की
या आप डाका कह लीजिये!
पैसे मैने शर्ट की जेब मे रखे और चुपचाप खडा हो गया!
कुछ देर बाद आन्टी आयी और उन्होने मेरे हाथ मे चार सौ दस रुप्ये थमा दिये!
“बेटा कुछ पूछते जाओ इससे,
कल वाला सवाल ही पूछ लो,
देखो इसने कुछ मेहनत की या नही!”
मै जाने को मुडा कि आन्टी कि आवाज ने मेरे कदम थाम दिये!
“आज नही आन्टी,
आज मन कुछ ठीक नही है!”
मै इतना कहकर भागने की तरह चलने लगा!
मेरे पाव उस वक्त मेरे रूम तक का सफर एक कदम मे तय करना चाहते थे!
जो कि मुमकिन ना था!
शर्ट की जेब मे रखे चार हजार रुपये मेरे जिस्म को आगे की तरफ झुकाये जा रहे थे!
दिमाग मे सही और गलत पर पैनल डिस्कशन चल रही थी!
और हर पैनल डिस्कशन की तरह यहा भी एक आवाज दूसरी आवाज को दबाये जा रही थी!
इन दोनो के शोर से मेरे सर मे दर्द शुरु हो गया था!
पिछले दो मिनट मे मेरे हालात मे आयी ये तब्दीली बता रही थी कि मेरे अन्दर का एक बडा हिस्सा मेरे इस कदम से नाराज था!
खैर मै रूम पर पहुचा और हाथ मे पैसे लेकर बैठ गया!
आधे घन्टे बाद जब मै उठा तो अपने आप को किसी भी तरह के गिल्ट से निकाल चुका था!
शाम हुई तो मैने सोचा की एक चक्कर आन्टी के यहा का भी लगा आऊ,
ऐसा ना हो कि उन्हे शक हो जाये!
दुकान तक पहुचा तो वहा खडी भीड ने मुझे एक सोच की गहराई मे धकेल दिया!
पास जाकर देखा तो वहा एक चालीस साल के करीब का दुबला पतला आदमी आन्टी को जानवरो की तरह पीटे जा रहा था!
पास खडी भीड खामोशी से इस “वीमेन एमपोवरमेंट” मे अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही थी!
वो आन्टी का पति था!
“बता कहा रखे है तूने पैसे?
सुबह ही दिये थे तुझे दुकानदार को देने के लिये,
किसे थमा कर चली आयी है तू?”
वो आदमी अपनी औकात से भी ज्यादा तेज आवाज मे चीखे जा रहा था,
और इस हौसले के पीछे उसके पेट मे तैरती और होटो पे रेंगती शराब का भी बडा योगदान था!
वरना वो इतनी तेज आवाज खुद की होश मे सुन ले तो या तो डर से मर जाये या हैरत से!
खैर मुझे पूरा मामला समझ आ गया था!
जेब मे पडे पैसे अब किसी कीडे की तरह मेरे जिस्म के अन्दर रेंगते हुये मालूम पड रहे थे!
घर पहुचा और अफसोस मे डूब गया!
जितनी जायज और शरीफ गालिया खुद को दे सकता था सब दे डाली मैने!
दिल तो कर रहा था कि अपने अन्दर के इस हिस्से को बाहर निकाल के मारू!
पर ये मुमकिन ना था शायद!
सुबह तक खुद को कोसता रहा आन्टी का मजबूर और शरमिनदगी से भरे चेहरे को सोच सोचकर!
खैर सुबह एक फैसला लिया जिसे दिल कि विधानसभा मे बहुमत से पास कराकर मै सरकारी नीन्द मे सो गया!
सुबह उठा और सीधा आन्टी की दुकान पर चला गया!
पैसो को मुट्ठी मे इस कदर भीचे हुये था कि जैसे अभी ये किसी मछली की तरह हाथ से फिसलकर दूर चले जायेंगे!
हथेलिया शर्मिन्दगी या पसीने से तर थी!
दिल मे सुकून था कि कुछ देर मे मै इस बोझ से निकल जाउंगा!
पर धीरे धीरे दोपहर हो गयी और आन्टी का कही कोई निशान नही था!
दोपहर बीती शाम बीती और फिर हफ्ता बीत गया!
मै उस बोझ को अपनी जेब मे ढोते हुये पूरा दिन उस दुकान के पास गुजार देता जो पिछले एक हफ्ते से वहा थी ही नही!
फिर एक सुबह ऊपर वाले को शायद मुझ पर रहम आ गया!
आन्टी अपने सर पर अपने सामान की टोकरी लिये और हाथ के चादर लिये आ रही थी!
मै खुश था कि आज मै इस बोझ से खाली हो जाउंगा!
आन्टी आयी तो मै तुरन्त उनके सामने जाकर खडा हो गया!
सोचा था कि माफी माग कर पैसे देकर चला आउंगा!
पर उनको देखकर अजीब सा लगने लगा!
बायी आन्ख अभी तक काली थी,
कान के छेद कट चुके थे,
शायद किसी ने उनकी बालियो को बेदर्दी से नोचा था!
जगह जगह चेहरे पर उनके मर्द की मर्दानगी की नक्काशी बनी हुई थी!
ये सब देखकर मेरी हिम्मत ना जाने किस रास्ते मेरे अन्दर से निकल गयी थी!
शर्मिन्दगी तो थी ही लेकिन अब डर भी लग रहा था!
खैर मैने सिगरेट खरीदी और पीने लगा!
धीरे से मैने अपनी जेब से चार हजार यू गिराये कि कोई देखे ना,
और सिगरेट पीता हुआ चला गया!
पीछे मुड के देखा तो आन्टी उन पैसो को हाथ मे उठाये देखे जा रही थी!
मेरे अन्दर एक अनजानी खुशी ने उस वक्त अपना डेरा डाल दिया!
बहुत हल्का महसूस कर रहा था मै अपने आप को,
जैसे अभी अभी एक लम्बी नीन्द लेकर उठा हू!
इतना सुकून तो मुझे तब भी नही मिला जब मैने ट्रेन मे बारह घन्टे के बाद,
सिगरेट पी थी!
खैर अब सब कुछ ठीक हो गया था!
बोझ उतर चुका था!
और बेशक मै अब पाक हो चुका था!

अगली सुबह उठा तो वो एक आम सुबह थी,
सब कुछ नोर्मल सब कुछ सही था!
आदतन मै आन्टी की दुकान के पास गया और सिगरेट लेकर जला ली!
आज मै उनके चेहरे के जख्म नही देख रहा था कयुकि मै अपनी शर्मिन्दगी से निकल चुका था!
खैर मै उस वक्त हर कश को सुकून मे बदलने मे लगा था!
“बेटा आप कल कुछ भूल गये थे”
आन्टी की आवाज ने मुझे मेरे तामझाम से निकाला!
“नही तो आन्टी कुछ भी तो नही”
मैने हडबडाते हुये कहा,
मानो कल की चोरी मेरी उस दिन की चोरी से बडी थी!
“अरे नही बेटा तुमहारी जेब से पैसे गिर गये थे कल,
जब तक मै बुलाती तुम जा चुके थे,
और फिर मैने सोचा की कल दे दुंगी!”
ये कहते हुये उनहोने मेरी तरफ दो लाल लाल नोट बढा दिये!
ये वही नोट थे जिनका रंग पहले दिन गुलाबी था!
कापते हाथो से मैने वो नोट थाम लिये!
“बेटा पैसे समभाल के रखा करो,
अब मुझे ही देखो पैसो के ही चक्कर मे मेरे मरद ने मेरी ये हालत कर दी!”
मै जा रहा था और मेरे पीछे आन्टी कि ये आवाज मेरे कानो मे गूंज रही थी!
मेरी मुट्ठी से कुछ लाल रंग की बून्दे निकल कर जमीन पर पड रही थी,
जिसकी वजह से वो गुलाबी नोट और लाल होते जा रहे थे!
रूम तक पहुचते पहुचते एक बाद मै समझ गया था,
“कि हर कोई अपने बोझ से निकल नही पाता,
कुछ बोझ उम्र भर ढोने के लिये होते है!”

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