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जहर – इक तरफ़ा प्रेम

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Hindi Story Jahar Ek Tarfa Prem

वो आज भी उसी जगह खड़ा था, उसी साइकिल की दुकान पर, मैं पिछले तीन दिन से उसे नजरअंदाज कर रही थी।  लेकिन आज शायद मुश्किल था।  साइकिल में हवा तो भरवानी ही थी मुझे।  “चाचा हवा भर दीजिये” मैंने साइकिल खड़ी करके चाचा से कहा।  “मैं भर देता हूं” उसकी आवाज से मैंने उसकी तरफ देखा, वो शैतानी हँसी से मुझे देख रहा था। “ठीक है बेटा, उसी से भरवाले, मैं अभी काम में हूँ जरा” ये कहकर चाचा ने पम्प उसे पकड़ा दिया। 


“तो क्या सोचा है तुमने?” उसने टायर की तरफ हाथ बढ़ाते हुए धीरे से कहा।  “सोचा है का क्या मतलब? एक बार बोल दिए कि हमे कोई दिलचस्पी नही फिर क्यों पीछे पड़े हो?” मैंने झुंझलाते हुए उससे भी धीमी आवाज में उससे कहा।  “हा वो तो लडकिया बोलती ही है, लेकिन जवाब कब दोगी तुम?’ उसने कहा।  मुझे समझ नही आ रहा था कि इनकार के लिए कौनसे ऐसे लफ्ज़ होते है जो मैं सीखना भूल गयी।  ऐसे कौनसे अल्फ़ाज़ है जिसे चीख कर चिल्लाऊं तो लोगो को मेरा इनकार सुनाई दे। 


क्या मेरा इनकार इतना धीमा है? या मेरे इनकार में वो शोर नही जो इन लड़को के कानों की लौ तक भी पहुच सके।  क्योंकि ये तीसरी बार हो रहा था, जब मैंने उसे मना किया हो, लेकिन इसकी नजर में ये कोई जवाब ही नही है। कैसा जवाब दु मैं इसे की ये समझ ले कि लड़की की हा सिर्फ उसकी हा में होती है,ना का मतलब हा नही होता। आखिर कैसे समझाऊँ इसकी लड़की सिर्फ फसने के लिए नही हँसती,वो इसलिए हँसती है क्योंकि उसे हँसना अच्छा लगता है। 


मैं कैसे समझाऊँ इसे की इसके फेवरेट हीरो जो प्यार फिल्मो में करते है वो प्यार नही शोषण होता है। मैं अपनी ही सोच में गुम थी, उसने जेब से कुछ निकाला और मेरे सामने रख दिया? “ये क्या है?”
मैंने पूछा।  “गुलाब है, हमारे पहले प्यार की निशानी।” उसने अजीब सी हँसी होठो पे मसल कर मुझसे कहा। हमारे? हम एक ऐसा लफ्ज़ है जो कम से कम दो लोगों को लेकर बनता है, लेकिन यहां इस लफ्ज़ में मैं तो थी ही नही। सिर्फ वो था, उसका पागलपन उसका अहंकार। 


मैं कही थी ही नही। या शायद, मेरा होना मायने ही न रखता हो, लेकिन मेरा होना मायने क्यों नही रखता? मैं भी तो वही हूँ, जो ये है, मांस, हड्डी, ख्वाहिश, जज्बात, सब तो है मेरे पास। क्या सिर्फ सीने पर उभार और टांगो के बीच की गहराई ने मुझे इससे अलग कर दिया? या मेरा गुनाह ही ये दो चीजें है? “क्या हुआ? खो गयी क्या मेरे प्यार में?” उसकी आवाज से मेरा ध्यान टूटा।  और साथ मे मेरा सब्र भी। मैंने गुलाब उसके हाथ से लिया, जितनी ताकत थी मेरी उंगलियों में वो सब लगाकर उसे नोचा, और फिर जमीन पर फेंक कर पैरो से मारने लगी। 


उसका चेहरा बता रहा था कि मैंने फूल नही उसके घमंड को पैरो तले रौंदा है। अब मुझे उसके चेहरे पर डर दिख रहा था, वो डर देखकर लगा, कि मेरे चेहरे का डर भी शायद ऐसा ही होता होगा। वो उठा और चला गया।  दिन भर मेरा ध्यान उलझा रहा।  रह रह कर अपने किये पर गुस्सा भी आ रहा था, शायद ज्यादा गुस्सा हो गयी थी मैं।  वापस आ रही थी तो वो फिर दिखा, डर से मैंने नजरे नीची कर ली।  क्योंकि यही करना आता था मुझे। 


लड़की की नजर अगर शर्म और डर से नीची न हो तो वो खराब लड़की होती है।  उसने कुछ दे बाद मेरी साइकिल का हैंडल पकड़ा मैं एक पैर नीचे रख कर रुक गयी।  उसकी आंखें, वो गुस्सा,
वो गुस्सा मेरी आँखों मे होना चाहिए था, लेकिन मेरी आँखें सिर्फ डरने के लिए बनी थी, इसलिए डर था आंखों में। उसने गुस्से से हाथ मे कुछ पकड़ा हुआ था, हैंडल पर रखे हाथ पर उसका पहला वार पता ही नही चला मुझे, न डर  न दर्द, कुछ नही था उस वक्त, कुछ देर बाद वो चला गया, जमीन पर पड़ी थी मैं, आस पास लोगो की भीड़ थी, इनमे बहुत से लोग उसके जैसे थे, जिन्हें शायद मौका नही मिला या डरपोक थे वो। 


मैं सुन्न आंखों से जमीन पर पड़े अपने जिस्म के उस टुकड़े को देख रही थी, जो दो मिनट पहले मेरे सोचने पर हरकत करता था।  मैं खून से लिपटे सड़क पर पड़े अपने हाथ को देख रही थी, और सोच रही थी, “इन्ही हाथों को वो गुलाब दे रहा था शायद।”

||समाप्त||

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