Home Dhinchak Lekh सच में जरूरते जीना सिखाती है |

सच में जरूरते जीना सिखाती है |

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Must Read for Motivation in Hindi

करीब दस बारह साल पुरानी बात है, नया नया फोन आया था हाथ मे। ये वो जमाना था जब एक रिंगटोन डलवाने का दस रुपए और 512 एमबी की मेमोरी फूल करवाने का 300 रुपया लगता था। ये वो दौर था जब फोन में वीडियो गाना होना ही बड़ी बात मानी जाती थी, फ़िल्म भी देखलेंगे ये बात तो कोई सोचता भी नही था। वाई फाई का सिर्फ नाम सुना था, क्या होता है क्या काम करता है कैसे काम करता है ये सब बस बाते ही थी।


भूत था वाई फाई, बस नाम सुना था, देखा किसीने नही था। उस दौर में गाने डाउनलोड करना बड़े धैर्य परिश्रम और खर्च का काम होता था। 2जी की स्पीड में छत पर खड़े होकर, आधे घंटे में मनपसंद गाना ढूढ़ना और उसे एक घंटे में डाउनलोड करना वीर और महान पुरुषों के ही कार्य थे।
ये वो दौर था जब लोग अपने फोन में अलार्म सेट करके रखते थे, ताकि भीड़ में बजने पर फोन निकाला जा सके, और आस पास के लोगो को मालूम हो कि भाई साहब बड़े आदमी है। उस वक्त, सिम मिलती नही थी खरीदनी पड़ती थी।


गाँव मे लोगो को मालूम होता था कि किस के पास कौनसा फोन है इस गाँव मे। फेसबुक और यूट्यूब तो विदेश में ही दफन थे। रेडियो मिर्ची ने विविध भारती की जगह ले ली थी, अब लोग ये उम्मीद नही रखते थे कि शायद अगले काल मे उनकी पसंद की फरमाइश कोई दूसरा करदे। लोग ख्वाहिशे मन मे दबा के बैठ जाते थे दो फोन लगाकर। ये वो दौर था जब दस साल पुराने गाने फिर से हिट होने शुरू हुए थे। लोग फोन खरीदते ही रिंगटोन सेट करते थे पहले। उस दौर में मैने अपने फोन में एक फ़िल्म के सारे गाने भर लिए थे। फ़िल्म थी दिल से।

गुलजार ने बहुत सी फिल्मो के गाने लिखे होंगे, लेकिन इस फ़िल्म जैसे गाने वो शायद चाहकर भी नही लिख सकते दुबारा। “मैं फर्श पे सजदे करता हूं, कुछ होश में कुछ बेहोशी में।” “ताबीज बनाकर पहनू उसे आयत की तरह मिल जाये कही” “रोज़ रोज़ रेशम सी हवा, आती जाती कहती है बता रेशम सी हवा वो जो दूध धुली मासूम कली वो है कहा कहा है।”

जिया जले गाने के बीच मे तमिल वाली लाइन न तो आज तक समझ आये न ही ढंग से ये समझ आया कि क्या बोला गया है उस लाइन में। इश्किया फ़िल्म में नसरुद्दीन शाह बताते है की इश्क के सात मुकाम होते है, लेकिन दिल से फ़िल्म में, मणिरत्नम और गुलजार ने कही भी जिक्र नही किया इस बात का लेकिन ये पूरी फिल्म इश्क के सात मुकामो पर बनी है।

रहमान के संगीत के बारे में बस इतना समझिए कि उनकी हर धुन फ़िल्म की कहानी को बयां करती है। इस फ़िल्म के हर गाने को अलग अलग गायक ने गाया है, उदित सोनू और सुखविंदर ने।
लेकिन हर गाने को सुनकर लगा कि यहीं आवाज हीरो की है। यही आवाज हीरो की हालत बया कर सकती थी।

और शाहरुख, शाहरुख की यही फ़िल्म देखकर मैंने अपने फोन के वालपेपर पर उसे लगा दिया था। शाहरुख खान ने इस फ़िल्म में एक्टिंग की है ओवर एक्टिंग नही। मनीषा कोइराला इतनी खूबसूरत लगी है कि लगता है कि शाहरुख की उनके प्रति दीवानगी जायज है। प्रीति जिंटा की पहली फ़िल्म है शायद। खैर, इन बातों का मतलब सिर्फ इतना था कि आज संडे है, डाउनलोड कर के देखिए, और महसूस करिये इश्क के सात मुकामो को।


🙂 दर्द के कागज़ पर कुछ लफ्ज़ आराम करने को, जज्बातों की तपिश में निखरने को संवरने को,
जज्बातों की छलनी से कुछ आंसू निकलने को रात होती ही है शायद कुछ ख्वाबो के मरने को।
शाम ढलने की कगार पर, परिंदे अपने घर की तरफ भाग रहे है। नीचे क्रिकेट खेल रहे बच्चों की बाल सामने वाले अंकल ने रख ली है। इसलिए वो भी अपने घरों की तरफ रुख कर रहे है। हेडफोन में नुसरत साहब की कव्वाली सुन रहा हूं। “सानू इक पल चैन न आवे सजना तेरे बिना।” नीचे जो लिखने जा रहा हूं वो न तो कोई कहानी है ना कोई पोलिटिकल पोस्ट, इसलिए कीमती वक्त वाले न पढ़े तो बेहतर।


यहां लोग लिखते है, सबकी अपनी अपनी वजह है लिखने की, कुछ को यहां वक्त गुजारना है,
कुछ को अपनी क्रश को इम्प्रेस करना है तो किसी को बस लाइक और कमेंट देख कर अच्छा फील होता है। कुछ को अपनी पार्टी को सपोर्ट करना है तो किसी को केजरीवाल और राहुल की फिर से इज्जत उछालनी है। सबके पास अपनी अपनी वजहे है। मैं अपने लिए अपनी खुशी के लिए लिख रहा हूं। मैं लिखता हूं क्योंकि मुझे और कुछ ढंग का करना नही आता।


मैं अपनी ही लिखी पोस्ट कई बार पढ़ता रहता हूं। ये जो बच्चे अभी खेल कर गए है, ये दरअसल मेरी सोच के साथ खेल कर गए है। मुझे उसी वक्त में वापस छोड़ कर गए है जब मैं और मेरे दोस्त दस रुपये की बाल के लिए बैठ कर प्लानिंग किया करते थे। चंदा, बड़ो से एक एक रुपये की भीख और चोरी तक की थी हमने। ये वो वक्त था जब जिंदगी में ये दस रुपये की बाल के अलावा और कोई चिंता थी ही नही। बस इसी मुश्किल को सुलझाने में लगे रहते थे। और कुछ दिनों में ये हल भी कर लेते थे।


घर से पैसे मिलते थे सब्जी लाने के लिए। और यहां से साजिशें शुरू होती थी मेरी। जिंदगी के इसी पड़ाव तक गणित अच्छी रही मेरी। पूरी सब्जी मंडी घूम जाता था ताकि कही पर आलू एक रुपये सस्ता मिल जाये। कभी कभी ये तरकीब काम कर जाती कभी कभी नही। लेकिन मैंने कहा न कि गणित अच्छी थी मेरी, तो इस बार भी रास्ता निकाल लेता था। एक किलो आलू के बजाय 800 ग्राम आलू, और दो रुपये की धनिया के बदले फ्री की सूखी और बासी धनिया, मिर्च तो फ्री में मिलती थी ही।


पूरी सब्जी मंडी घूम कर मै दो या तीन रुपया तो कमा ही लेता था। उसके बाद रास्ते भर हिसाब रटते हुए जाता था, ताकि अम्मी के सामने जबान न लडखडाये। ये चोरी और बेईमानी मुझे अगले दिन बाल खरीदने लायक बना देती थी। और फिर मैं अपनी जिंदगी की उस मुश्किल को पार करके, सुकून से क्रिकेट खेलने लगता। गलत तरीके से ही सही लेकिन मैंने एक बार फिर अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किल हल करके सुकून लिया भी नही होता कि बाल फिर उसी अंकल के खेत मे चली जाती, जो हमारे खेलने के टाइम अपने खेत के पास ही रहता।


एक घंटे के खेल के बाद मैं फिर वही खड़ा हो जाता जहा से कल मैंने चलना शुरू किया था।
लेकिन जिंदगी की साजिशें मेरे हौसले से हर बार कमजोर साबित होती, क्योंकि मैं फिर से उस मुश्किल को हल करने निकल पड़ता, और तब तक नही रुकता था जब तक मैं बाल खरीद न लू।
जिंदगी आज भी मेरी बाल अपने पास रख लेती है, मैं आज भी सब्जी मंडी में खड़ा मोल भाव कर रहा होता हूं। जिंदगी जानती नही कि मैं अभी भी बदला नही हूं। मैं आज भी उस अंकल से गिड़गिड़ा कर बाल वापस नही माँगता। जिंदगी अभी नही जानती मुझे……

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